देश में अभी एक सदी दूर है लैंगिक समानता

31-05-2021 20:06:22
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देश में अभी एक सदी दूर है लैंगिक समानता

वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की रिपोर्ट ने किए कई अहम खुलासे

- आलोक यात्री - 

विश्व आर्थिक मंच (वर्ल्ड इकोनामिक फोरम) की इस साल की वैश्विक लैंगिक भेदभाव रिपोर्ट में 156 देशों में भारत 144वें स्थान पर खिसक गया है। बीते साल भारत 112वें स्थान पर था। जाहिर है देश में लैंगिक असमानता की दर बढ़ी है। दूसरी ओर आइसलैंड लगातार 12वीं बार दुनिया में सबसे ज्यादा लैंगिक समानता वाले देश के रूप में शीर्ष पर है। आइसलैंड में समानता का स्तर करीब 90 फीसदी है। इस मामले में फिंनलैंड दूसरे, नॉर्वे तीसरे, न्यूजीलैंड चौथे और स्वीडन पांचवे स्थान पर रहा है। आमतौर पर पिछड़े माने जाने वाले नामिबिया, रवांडा और लिथुआनियां जैसे देश भी इस मामले में शीर्ष 10 देशों में शामिल हैं। सोचने वाली बात यह है कि यह रिपोर्ट उस समय आई है जब केंद्र में सत्तारूढ़ दल अपनी उपलब्धियों का बखान जी-जान से कर रहा है। यह रिपोर्ट उस समय और भी महत्वपूर्ण और प्रासंगिक हो जाती है जब भारत को दुनिया भर में तीन तलाक से मुक्त, महिला आरक्षण और लैंगिक सहभागिता के बरक्स देखा जा रहा हो।

रिपोर्ट यह सोचने पर मजबूर करती है कि आज का भारत क्या सिर्फ खोखले वादों के इर्द-गिर्द ही सिमट कर रह गया है? दरअसल आज के दौर में सरकारें वही दिखातीं हैं जो वह दिखाना जरूरी समझती हैं। भले ही तस्वीर हकीकत से कोसों दूर हो। जिन राज्यों में चुनाव हो रहे हैं वहां की गई घोषणाओं पर एक नजर डालने से ही यह स्पष्ट हो जाता है कि लगभग हर क्षेत्र में फिसल रहे देश को संभालने का कोई दावा या वादा नहीं किया जा रहा है।

एशिया में सिर्फ पाकिस्तान और अफगानिस्तान हैं भारत से पीछे

सबसे शर्मनाक पहलू यह है कि एशिया में सिर्फ पाकिस्तान और अफगानिस्तान ऐसे देश हैं जो लैंगिक समानता के मामले में भारत से पीछे हैं। भारत से आगे देशों में बांग्लादेश की स्थिति कहीं बेहतर है। सूची में वह 65वें स्थान पर है। लिहाजा यह सवाल उठना लाजमी है कि 21वीं सदी का भारत जा कहां रहा है? हमारी लड़ाई क्या सिर्फ अफगानिस्तान और पाकिस्तान से ही रह गई है?

वैश्विक लैंगिक भेदभाव में 32 पायदान नीचे खिसका भारत

इस संदर्भ में गौर करने वाली बात यह है कि देश में लंबे समय से बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ, उज्ज्वला योजना समेत महिलाओं के सशक्तिकरण और उन्हें बढ़ावा देने की कई योजनाओं पर अमल चल रहा है। बावजूद इसके वैश्विक लैंगिक रिपोर्ट 2021 में भारत 32 पायदान नीचे आ गया है।

गौरतलब है कि वैश्विक लैंगिक अंतराल के आकलन की जरूरत पहली बार 2006 में महसूस की गई थी। जिसमें आर्थिक भागीदारी और अवसर, शिक्षा का अवसर, स्वास्थ्य एवं उत्तरजीविता तथा राजनीतिक सशक्तिकरण के आधार पर महिलाओं की उपलब्धियों का आकलन किया जाता है। रिपोर्ट खुलासा करती है कि इस क्षेत्र में खासकर दक्षिण एशियाई देशों में भारत का प्रदर्शन सबसे खराब रहा है। रैंकिंग में भारत 156 देशों में 144वें स्थान पर खड़ा है। जबकि बांग्लादेश 65वें, नेपाल 106वें, श्रीलंका 116वें, भूटान 130वें, पाकिस्तान 153वें, अफगानिस्तान 156वें स्थान पर हैं। वैश्विक लैंगिक अंतराल सूचकांक 2020 में भारत 153 देशों में 112वें स्थान पर था। 

वैश्विक स्तर पर राजनीतिक सशक्तिकरण सूचकांक में आई 13.5 फीसदी की गिरावट

राजनीतिक क्षेत्र का आकलन साफ बताता है कि देशों में राजनीतिक सशक्तिकरण सूचकांक में 13.5 फीसदी की गिरावट आई है। वर्ष 2019 में मंत्रिमंडल में महिला मंत्रियों की हिस्सेदारी 23.1 फीसदी थी। जो वर्ष 2021 में घटकर महज 9.1 फीसदी रह गई है। वैश्विक स्तर पर संसद की कुल 35500 सीटों में से महिलाओं का प्रतिनिधित्व महज 26.1 फीसदी है। कुल 3400 से अधिक मंत्रियों में से केवल 22.6 फीसदी महिला प्रतिनिधि हैं। सूची में 81 देश ऐसे हैं जहां 15 जनवरी 2021 तक किसी महिला प्रमुख की नियुक्ति नहीं हुई थी। बांग्लादेश एकमात्र ऐसा देश है जहां बीते 50 वर्षों में पुरुषों की तुलना में महिलाओं की संख्या अधिक रही है और राज्य व देश के प्रमुख पदों पर भी वह आसीन हैं।

पेशेवर और तकनीकी भूमिकाओं में 29.2 फीसदी तक घट गई है भी महिलाओं की भागीदारी

आर्थिक भागीदारी के मामले में सर्वाधिक लैंगिक अंतराल वाले देशों में ईरान, भारत, पाकिस्तान, सीरिया, यमन, इराक और अफगानिस्तान शामिल हैं। इनमें से अधिकांश देशों में महिलाओं की आर्थिक भागीदारी भी कमजोर साबित हुई है। रिपोर्ट के अनुसार भारत में इस वर्ष आर्थिक भागीदारी में अंतर 3 फीसदी बढ़ गया है। पेशेवर और तकनीकी भूमिकाओं में भी महिलाओं की भागीदारी 29.2 फीसदी तक घट गई है। देश में महिलाओं की अनुमानित आय पुरुषों के मुकाबले मात्र 20 फीसदी है। जिस वजह से देश इस पायदान पर वैश्विक स्तर के मुकाबले 10 पायदान नीचे है। उच्च और प्रबंधकीय पदों पर भी महिलाओं की हिस्सेदारी 14.6 फीसदी है। यही नहीं देश में महज 8.9 फीसदी फर्मों में ही महिला प्रबंधक शीर्ष पर हैं।

स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी खराब रहा भारत का प्रदर्शन

स्वास्थ्य और उत्तर जीविता सूचकांक के क्षेत्र में भी भारत का प्रदर्शन खराब रहा और यह 155वें स्थान पर रहा। इस क्षेत्र में चीन की स्थिति भी कमोबेश यही है। आंकड़े बताते हैं कि प्रसव पूर्व लिंग परीक्षण जैसी प्रथाओं के चलते प्रतिवर्ष गायब होने वाली बालिकाओं के 1.2 से 1.5 मिलियन मामलों में 90 से 95 फीसदी मामले केवल भारत और चीन के हैं।

समानता का संवैधानिक अधिकार होने के बावजूद संक्रमण काल से गुजर रही है महिला विकास यात्रा

देश में महिलाओं को संविधान प्रदत अधिकार और समानता के संदर्भ में उल्लिखित परिभाषा गौर करने लायक है। अनुच्छेद-19 में महिलाओं को यह अधिकार दिया गया है कि वह देश के किसी भी हिस्से में नागरिक की हैसियत से स्वतंत्रता के साथ आवागमन कर सकती हैं, स्वेच्छा से कहीं भी रह सकती हैं। व्यवसाय का चयन भी स्वतंत्र रूप से कर सकती हैं। महिला होने के कारण किसी भी कार्य के लिए उनको रोकना, मना करना, उनके मौलिक अधिकारों का हनन होगा। महिलाओं की स्वतंत्रता की पैरोंकारी यूं तो स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से ही प्रारंभ हो गई थी। लेकिन 21वीं सदी में स्त्री समानता का मुद्दा अधिक मुखर होकर सामने आया है। बावजूद इसके महिला विकास यात्रा आज भी संक्रमण काल से गुजर रही है।

पुरुष प्रधान समाज में आज भी निरंतर जारी है स्त्री की समानता का संघर्ष

संवैधानिक तौर पर महिलाओं को हर क्षेत्र यानी शिक्षा, स्वास्थ्य, धार्मिक, विधिक, आर्थिक, श्रम, व्यवसाय, लैंगिक समानता में संवैधानिक अधिकार प्रदत्त होने के बावजूद महिलाओं का संवैधानिक संघर्ष आज भी जारी है। महिलाओं की स्थिति को मजबूत करने के लिए समय-समय पर संविधान में संशोधन भी किए गए और किए जा रहे हैं। बावजूद इसके पुरुष प्रधान समाज में स्त्री की समानता का संघर्ष आज भी निरंतर जारी है। और तो और सबरीमाला मंदिर और हाजी अली दरगाह में प्रवेश को लेकर लड़ी जा रही स्त्रियों की लड़ाई भी अभी किसी मुकाम पर नहीं पहुंची है।

वास्तविक रूप से समानता लाने में लगेगा एक सदी से अधिक समय

रिपोर्ट का सीधा सा आशय यह है कि समाज में महिलाओं को पुरुषों के बराबर का दर्जा देने की बात हर मंच पर होती है, लेकिन रिपोर्ट संकेत करती है कि वास्तविक रूप से समानता लाने में एक सदी से अधिक का समय लगेगा। ताजा आंकड़े और जमीनी हकीकत इशारा कर रहे हैं कि महिला-पुरुषों के बीच असमानता की यह दूरी समाप्त करने में 135.6 साल का लंबा समय लगेगा। बीते साल की रिपोर्ट के आधार पर इस अवधि को 99.5 साल आंका गया था यानी 12 महीने के अंतराल में ही यह अंतर करीब 36 साल बढ़ गया है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं कवि हैं)


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